Digital Politics (Hindi): यह वैश्‍विक महामारी डिजिटल राजनीति को कैसे चलाएगी

इस वैश्विक महामारी ने आम जिंदगी के अनेक पहलुओं को प्रभावित किया है। यह भारत की धीमी प्रगति तक को भी नष्‍ट करने की क्षमता रखती है। सिर्फ एक ही झटके में, ऐसे बहुत से लोग जो अब बेहतर जिंदगी जी चुके हैं, फिर से उसी दुनिया में वापस धकेल दिए जाने की संभावना से रूबरू हैं जिसे वे अपने ख्‍याल में हमेशा के लिए पीछे छोड़ आए थे।

खुशहाली की तलाश में शहरों को पलायन कर चुके अनेक प्रवासी मजदूर फिर से अपने गांव लौट आए हैं और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पर निर्भर है।

सेवा क्षेत्र में सर्वत्र अनेक लोगों का आजीविका से संपर्क टूट गया है – क्योंकि सेवाओं को संग्रहण या अतीत से उपभोग नहीं किया जा सकता है। ये तरंगें राजनीति की दुनिया को भी बेशक झकझोर कर निकलेंगी।

राजनिति अपने स्वभाव से ही तुनकमिजाजी-अहसासों से जुड़ी कवायद है – संपर्क साधने का खेल। नेता ही “कर्ता-धर्ता” हैं – वे बाहर जाकर लोगों से मिल रहे हैं, छोटे समारोहों से लेकर बड़ी रैलियां कर रहे हैं और रोज़ मिलने-जुलने वालों के निरंतर प्रवाह को भी संभाल रहे हैं। उन्‍हें लोगों के बीच दिखाई देना है। उनके लिए, लोगों से बातचीत करना और उनकी प्रतिक्रिया जानना ही उनका स्‍फूर्तिवर्धक है।

इस महामारी ने सब कुछ बदल कर रख दिया है। नेताओं के लिए, शारीरिक दूरी का अर्थ है लोगों के साथ उनका सीधा संपर्क बहुत सीमित हो गया है। बड़े सम्मेलन/आयोजन तो कतई ना ना।

अब बाहर जाने और लोगों के साथ घुलने-मिलने का हर फैसला खतरा आंकने की जरूरत रखता है।

यदि कोई चुनाव आ रहा हो, तो चुनौतियां बढ़ जाती है। वैश्विक महामारी के समय चुनाव प्रचार कैसे काम करता है? क्या एक अकेली मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देना वहीं जज्बा पैदा कर सकता है जो खुले मैदान में हज़ारों की भीड़ के एकसाथ हुंकार भरने पर पैदा होता है?

इस पृष्ठभूमि में, इस वैश्विक महामारी के बाद की राजनीति किस तरह की दिखाई देगी? पहली बार के मतदाताओं का नेताओं और उनकी पार्टियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या पहले से ही बड़ी पार्टियां और भी मजबूत बनेंगी या इसकी वजह से नए प्रतिद्वंदी उभर कर सामने आएंगें?

यह जानने के लिए, आइए देखें कि पिछले एक दशक में राजनीति डिजिटल मायनों में कैसे बदल गई है।

प्रौद्योगिकी का उदय

2009 के चुनाव में SMS और आउटबाउंड वॉइस कॉल का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल देखा गया था। परंतु ज्‍यादातर हिस्‍से में, राजनीति फिर भी ऑफलाइन डोमेन में काम रही थी – बड़ी-बड़ी रैलियों, पारंपरिक मीडिया और प्रचंड दैहिक प्रचार का ही बोलबाला था।

2014 तक, सोशल मीडिया को अपनाने का चलन बढ़ गया था। फेसबुक चुनाव प्रचार का एक अभिन्न अंग बन गया था। अनुकूल परिणामों के लिए किन सीटों, बूथों और मतदातों को लक्ष्‍य बनाना है – इन सबके साथ डाटा मुख्य भूमिका निभाने लगा था। (प्रकटन: मैं इस चुनाव में नीति सेंट्रल जैसे मीडिया प्लेटफार्म के द्वारा एक किरदार था।)

व्हाट्सएप, टि्वटर और फेसबुक के दूर-दूर तक फैले हुए इस्‍तेमाल के कारण 2019 का चुनाव डिजिटल प्रयोग की सीढ़ी में एक पायदान और ऊपर चढ़ गया था। यह भारत का पहला “सोशल मीडिया चुनाव” था। अगर बीजेपी के पास नमो एप था तो कांग्रेस के पास शक्ति था। इस खेल का काम था बिचौलियों (पार्टी के कार्यकर्ताओं और प्रेरित स्वयंसेवकों) का सशक्तीकरण करना, जो मतदाताओं के बीच चुनिंदा समर्थकों तक उनका संदेश पहुंचा सके।

मतदाताओं को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है: वफादार (या प्रतिबद्ध मतदाता), गुट-निरपेक्ष (या मनमौजी मतदाता) और गैर-मतदाता। जैसा कि पाया गया है, तीनों खेमों में से हर खेमे में एक-तिहाई मतदाता हैं। 2019 के लोक सभा चुनाव में लगभग 27 करोड़ मतदाताओं ने मतदान नहीं किया था। लोकनीति पोस्ट-पोल सर्वेक्षण के अनुसार, जिन्होंने मतदान किया था, उनमें से लगभग आधे मतदाताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान या मतदान करने से कुछ दिन या कुछ घंटे पहले अपना मन बनाया था। ऐसे में हमारे पास सिर्फ वफादार ही बचते है जिनके लिए उम्मीदवार नहीं बल्कि सिर्फ पार्टी का चिन्ह मायने रखता है।

इस तरह, 90 करोड़ मतदाताओं में मोटे तौर पर 30-30-30 का विभाजन है: 30 करोड़ वफादार, जो मतदान करते हैं और चिन्ह के आधार पर अपनी मनपसंद पार्टी के लिए मतदान करते हैं, 30 करोड़ गुट-निरपेक्ष जो अपना मतदान तय करने के लिए मतदान के दिन तक इंतजार करते है और 30 करोड़ गैर-मतदाता जो मतदान ही नहीं करते हैं।

नेताओं के सामने गुट-निरपेक्ष और गैर-मतदाता क्षेत्र को मनाना एक बड़ी चुनौती होगी। गुट-निरपेक्ष वह लोग माने जाएं जो चुनाव के परिणाम बदल सकते हैं – इन्होंने 2019 में बीजेपी को असाधारण जीत दिलाई थी (2019 में बीजेपी ने 303 सीटों में से 230 सीटें जीती थी और मतदान का शेयर 50% से अधिक था; अर्थात जीत का प्रतिशत कांग्रेस की 1984 में जीत से कई गुना बेहतर था।)

गुट-निरपेक्ष मतदाता मुख्य रूप से संवेदनशील होते है क्योंकि उन्हें मनाना पड़ता है। हवा बहुत काम की होती है – और यह विभिन्न आयोजनों के द्वारा पैदा की जाती है। वैश्विक महामारी के समय इस मुरझे हुए चुनाव प्रचार में, इन मतदाताओं को कैसे रिझाया जाएगा, यह एक यक्ष प्रश्न बन जाता है।

गैर-मतदाता क्षेत्र भी महत्वपूर्ण बन सकता है – यदि वे अपना मन बदलकर मतदान करने को तैयार हो जाएं, तो उनका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल हो सकता है और वे अपने मतदान से आश्चर्य-चकित कर सकते हैं। अब अनेक प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं – जहां वे शायद मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं। ज्यादातर चुनावों में, सिर्फ कुछ-एक प्रवासी मतदान करने के लिए अपने गांव वापस जाते हैं। अगर अब वे मतदान करते हैं तो वे किसका पलड़ा भारी करेंगे? यही बात युवाओं पर भी लागू होती है – कई जो अब वापस अपने घर लौट आए हैं जहां शायद वो मतदाताओं के रूप में पंजीकृत होंगे।

हर चुनाव प्रचार के बुनियादी नियम शाश्‍वत हैं: सही मतदाताओं की पहचान करना, रजिस्‍टर करना, मनाना और अपनी ओर मोड़ना। डाटा और डिजिटल संसार क्‍या करता है, यह टारगेट करने की प्रक्रिया में सटीकता लाता है। यह वह संसार है जिसे डिजिटल तकनीक प्रभावित करेगी और आने वाले महीनों और सालों में और भी ज्‍यादा कायापलट करेगी।

डिजिटल नेता

वैश्विक महामारी से पीड़ि‍त भारत में, अब स्‍मार्टफोन के बिना जिंदगी लगभग नामुमकिन है। ट्रेन में जाना चाहते हैं – आपको आरोग्‍य सेतु ऐप की जरूरत है। पढ़ना चाहते हैं – स्‍कूल अब ऑनलाइन है। पता लगाना चाहते है कि किस अस्‍पताल में बेड उपलब्‍ध है – ऐप आपको बताएगा। किसी स्टोर पर जाने का खतरा मोल लिए बिना कुछ ऑर्डर करना चाहते हैं – इसके लिए ऐप मौजूद है। बस कुछ समय बिताना चाहते हैं – इसके लिए भी अनेक ऐप मौजूद हैं।

कुछ साल पहले, भारत डिजिटल पाषाण युग में था। जियो की लॉन्च और उसके बाद कीमत के गलाकाट मुकाबले ने वह अवसर पैदा किया, जिसने अधिकांश भारतीय घरों को सस्ते डाटा के साथ किफायती फोन भी दिए। यही वह डिजिटल नींव है जिसका अब नेता अपना काम करवाने के लिए लाभ उठा सकते हैं।

बुनियादी स्‍तर पर, नेताओं के पांच प्रमुख काम होते हैं: कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को संभालना; अपने निर्वाचन-क्षेत्रों की मतदाता फ़ाइल तैयार करना; अपने संदेश सर्वत्र पंहुचाने के लिए अपने समर्थकों (वफादारों और कुछ गुट-निरपेक्ष लोगों) के साथ संपर्क साधना; मतदाताओं से उनकी वेदनाओं और आशाओं के बारे में फीडबैक प्राप्त करना; और चुनाव के दिन वोट पाने के लिए बूथों का प्रबंधन करना।

अब डिजिटल यह प्रत्येक काम अधिक कार्यकुशलता से करने में उनकी मदद कर सकता है। यहां प्रणबद्धता पर निगरानी रखने के लिए कस्‍टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट (सीआरएम) सिस्‍टम बनाने वाले कारपोरेट जगत और व्यवसायों के साथ कई समानताएं हैं। लेकिन राजनीति और कारोबार के बीच एक बहुत बड़ा अंतर यह भी है कि राजनीति में दूसरे स्‍थान पर आने वाले के लिए कोई इनाम नहीं हैं – क्या गलत हुआ, यह पता लगाने और अगले चुनाव की तैयारी करने में ही बंदे को पांच साल लगाने पड़ जाते हैं।

‘जो जीता वहीं सिकंदर’ की राजनीति के आज के जमाने में, अब डिजिटल ही विशिष्‍टता प्रदान करने वाला घटक होगा। मतदाता अपने बाकी कामों के लिए पहले ही डिजिटल बन चुके हैं – अब नेताओं के लिए भी पहले डिजिटल बनने का समय आ गया है।

ऑफलाइन-से-ऑनलाइन में यह बदलाव जो पिछले कुछ महीनों में उपभोक्‍ताओं को सेवा प्रदान करने वाले अनेक कारोबार में हुआ है। अनेक कारोबारों के लिए, यह ओमनी-चैनल होना नहीं था – बस ऑनलाइन होना ही विकल्प था। नेताओं के लिए भी, यही कहानी होने वाली है। सीधे संपर्क से चौकन्ने इस संसार में, कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और मतदाताओं के साथ इंटरफेस को डिजिटल बनने की ओर शिफ्ट होना पड़ेगा।

 एक डाटाबेस, तीन ऐप

नेताओं को जो पांच काम करने होते हैं, उन्‍हें करने के लिए डिजिटल राजनीति को एक डाटाबेस और तीन ऐप की जरूरत होगी। शुरुआती बिंदु मतदाता डाटाबेस ही होना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई नेताओं ने इसे तैयार करना पहले ही शुरू कर दिया था। यह अब सभी संवादों और मुलाकातों का केन्‍द्र बन जाएगा।

यह डाटाबेस, कस्‍टमर डाटा प्लेटफॉर्म जैसा है जो उपभोक्ताओं को सेवा देने वाले ब्रांड्स कई साल से इस्‍तेमाल कर रहे हैं। कस्‍टमर डाटा प्लेटफॉर्म सारे कस्‍टमर्स का डाटा एक रिपोज़टरी में इकट्ठा करते हैं। इसमें पहचान (नाम, ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर), जनसांख्यिकी सूचना (आयु, लिंग, स्थान), व्यवहारवादी डाटा (ऐप अथवा वेबसाइट पर किए गए काम) और लेन-देन का डाटा (सभी खरीदों का विवरण) शामिल है। यदि इन सबको एकसाथ लिया जाए, तो कस्‍टमर डाटा प्लेटफॉर्म हर कस्‍टमर की एक एकीकृत तस्‍वीर मुहैया कराता है।

नेताओं के लिए, मतादाता फाइल कस्‍टमर डाटा प्लेटफॉर्म के बराबर है। प्रत्येक मतदाता के लिए, सारी सूचना को इकट्ठा करके एक ही डाटाबेस में रखना होगा – वोटर आईडी, मोबाइल नंबर, वफादारी का स्तर और मतदान करने की संभावना। मतदाताओं के रिकार्ड के साथ, किन जगहों और किन योजनाओं से मतदाताओं को लाभ पहुंचा है, इनके बारे में भी नेता को जानकारी होनी चाहिए। इन सब जानकारियों से लैस होकर, अब नेता के लिए प्रत्येक मतदाता के साथ संवाद को निजी बनाना संभव हो जाता है – एकदम वैसे, जैसे सभी बड़े कारोबार अपने कस्‍टमर्स के साथ करते हैं। डाटाबेस तैयार हो जाने के बाद, डिजिटली माहिर नेता को बिचौलियों – कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को संभालने के लिए एक ऐप की जरूरत होगी। ठेठ तौर पर यह व्हाट्सएपख, फोन एवं निजी संपर्क के मिले-जुले स्‍वरूप के द्वारा किया जाता है। बेहतर व्‍यवस्‍था के लिए एक अपग्रेड की जरूरत है जो हाइआर्की बनाने, कार्य सौंपने और कामकाज की निगरानी करने में समर्थ बनाए। ठीक जैसे कारपोरेशनों में मैनेजर अपने कर्मचारियों की निगरानी करने के लिए नए ऐप्‍स की जरूरत महसूस कर रहे हैं, ठीक वैसे ही नेताओं को अपने अगले लेवल के साथ प्रणबद्ध होने के लिए एक ऐप की जरूरत होगी।

दूसरा ऐप मतदाता संवाद और प्रणबद्धता के लिए है। जैसा कि निकट भविष्य में शक्ति प्रदर्शन के विशालकाय आयोजनों की संभावना उत्तरोत्तर बहुत कम हो रही है, नेताओं को अपना चेहरे, पार्टी चिन्ह और संदेश सर्वत्र पंहुचाने के लिए बराबरी के डिजिटल ईवेंट्स और रैलियों की जरूरत होगी। मानो जैसे जूम स्टेरॉयड पर है।

जैसा कि अब निजी तौर पर संवाद खयालों से परे है, इसलिए इस प्रक्रिया में नेताओं को लोगों की सोच को बेहतर ढंग से जानने के लिए सर्वेक्षण भी करवाने की जरूरत है। चाय पर चर्चा जैसे अभियानों को स्क्रीन पर चर्चा बनना होगा। हम इस साल के अंत में होने वाले बिहार राज्य के चुनावों के लिए शुरू हुए चुनाव प्रचार में इसके संकेत पहले से ही देख रहे हैं।

तीसरा ऐप की बूथ प्रबंधन के लिए जरूरत है। एक ठेठ लोकसभा निर्वाचन-क्षेत्र में 1500-2000 बूथ हो सकते हैं, जबकि एक विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र में 200-300 बूथ होते हैं। हर बूथ पर करीब एक हजार मतदाता (करीब 250 परिवार) होते हैं। मतदान के नजदीकी दिनों में बूथ कार्यकर्ताओं को संभालने और उनका मार्गदर्शन करने की जरूरत है कि किन मतदाताओं को मनाना और चुनाव के दिन मतदान करने के लिए लाना है। बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव इसकी अग्नि-परीक्षा होगी कि डिजिटल बूथ मैनेजमेंट कैसे काम करता है।

संक्षेप में, कार्यकर्ताओं के साथ समन्‍वय, मतदाताओं के साथ दोतरफा संवाद और बूथ प्रबंधन के लिए इन तीन ऐप्‍स के साथ मतदाता डाटाबेस आने वाले समय में डिजिटल राजनीति की नींव स्‍थापित कर सकता है।

निष्‍कर्ष

प्रणबद्धता मॉडल को ऑफलाइन से ऑनलाइन में शिफ्ट करने के अलावा, यह वैश्विक महामारी मौजूदा राजनीति में लगभग तीन दूसरे बदलाव भी लाएगी।

पहला, यह अपेक्षाकृत अधिक युवा नेताओं को प्रोत्साहित कर सकती है। बुजुर्गों के इस वायरस के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारण वे बाहर आने से कतराएंगे – जब तक कि इसका टीका न आ जाए।

दूसरा, लोगों द्वारा अधिक आर्थिक बदहाली महसूस किए जाने के साथ, अब बेहतर भविष्य के सपनों की तुलना में आज ही अधिक पैसा मुहैया कराने वाले उपाय अधिक स्वीकार्य हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, बेहतर भविष्य का वादा करने वाले नेताओं की तुलना में वर्तमान में पैसा देने का वादा करने वाले नेता अधिक आकर्षित कर सकते हैं।

फिर, नेताओं के खिलाफ उनकी भावनाएं बदलने का खतरा है। अगर इस वैश्विक महामारी ने फैलना जारी रखा और लॉक-अनलॉक का दोहरापन बरकरार रहा तो आक्रोश बढ़ना शुरू हो सकता है। वैसे तो भारतीय लोग काफी सब्र वाले होते हैं, परंतु कुछ-एक हालातों में, हालातों के खिलाफ उनके मन में दबा हुआ आक्रोश बढ़ना शुरू कर सकता है।

भले ही जब नेता डिजिटल बनने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तब क्या प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक व्यवधान उत्पन्न करने के लिए नए मंच और बाज़ार तैयार कर सकते हैं? अगर वहां भारत को नए पथ पर अग्रसर करने और भारतीयों को गरीब रखने की ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का कोई अवसर है तो वह यह पल है। क्या डिजिटल-माहिर राजनीतिक उद्यमी सुन रहे हैं?

This is a translation of the original essay written in English by Rajesh Jain for Mint (July 31, 2020). If you find any errors, please rajesh@nayidisha.com.